
भयंकर रण समर मे श्री गीता का ज्ञान देना ही कृष्ण है – आशीष उपाध्याय

आरा। भोजपुर जिले के विभिन्न गाँवो मे कृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा अर्चना के साथ ही आरती उतारी गई।नाना प्रकार के भोग लगाये गये, ढोल, नगाढे, घंटा, शंख नाद किये गये।भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया।वहीं टाउन स्कूल आरा मे कार्यरत शिक्षक प्रबोध कुमार मिश्र एवं शिक्षक आशीष उपाध्याय ने बड़े ही सुंदर तरीके से कृष्ण सुदामा के मित्रता एवं कृष्ण के स्वरूप एवं उनके त्याग का वर्णन किया।

उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण और सुदामा बचपन के मित्र और गुरुकुल में सहपाठी थे और उन्होंने गुरु सांदीपनि के मार्गदर्शन में अध्ययन किया था।उनकी शिक्षा पूरी होने पर वह अलग हो गए लेकिन कृष्ण और सुदामा अलग नहीं हुए एवं अपनी दिव्य मित्रता को नही भुल पाए।आज के जमाने मे भी कृष्ण और सुदामा की दोस्ती एक मिशाल है।जब भगवान कृष्ण बालपन में ऋषि संदीपन के यहाँ शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तो उनकी मित्रता सुदामा से हुई।जहां एक तरफ कृष्ण जी का जन्म एक राजपरिवार में हुआ था वहीं सुदामा ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए परंतु आज भी दोनों की दोस्ती का गुणगान पूरी दुनिया करती है।

शिक्षा दीक्षा समाप्त होने के बाद भगवान श्री कृष्ण राजा बन गए वहीं दूसरी तरफ सुदामा के बुरे दिन शुरू हो गए। अपनी स्थिति खराब होने के बाद सुदामा की पत्नी ने उन्हें राजा कृष्ण से मिलने जाने के लिए कहा।वहीं पत्नी का जिद मानकर सुदामा अपने बाल सखा कृष्ण से मिलने उनकी नगरी द्वारका गए।जब राजा कृष्ण अपने मित्र सुदामा के आने का संदेश पाकर वह खुद नंगे पैर उन्हें लेने के लिए दौड़ पड़ते हैं और मित्र सुदामा की दयनीय हालत देखकर भगवान कृष्ण के आंसू थमने का नाम नही ले रहा था।वहीं भगवान ने सुदामा का पैर अपने आंसुओं से धूल दिया। यह घटना भगवान श्री कृष्ण का अपने मित्र सुदामा के प्रति अनन्य प्रेम को दर्शाता है। इसलिए कृष्णा सुदामा की दोस्ती की मिसाल आज भी दी जाती है गोबिंद सबके दुःख हरते हैं।अगर गोबिंद भी मनुष्य का तन धारण करते हैं तो उन्हें भी संसारिक मोह-माया से रुबरु होना पड़ता है।संसार की सारी रचना गोबिंद की माया से ही चलती है।इस नश्वर भौतिक सुख के प्रति मनुष्य पागल है। सबको छोड़कर गोबिंद की शरण में चले आओ आपके दुःख स्वत: ही समाप्त हो जायेंगे।सुदामा जैसे ही गोबिंद की शरण में आये उनके सारे दुःख का अंत हो गया।वहीं उन्होंने कहा कि जितनी चीज़ें कृष्ण से छूटीं उतनी तो किसी से नहीं छूटीं। कृष्ण से उनकी माँ छूटी, पिता छूटे, फिर जो नंद-यशोदा मिले वे भी छूटे। संगी-साथी छूटे। राधा का छूटना तो भूला ही नहीं जा सकता। गोकुल छूटा, फिर मथुरा छूटी।

कृष्ण से जीवन भर कुछ न कुछ छूटता ही रहा। कृष्ण जीवन भर त्याग करते रहे। हमारी आज की पीढ़ी जो कुछ भी छूटने पर टूटने लगती है, उसे कृष्ण को गुरु बना लेना चाहिए। जो कृष्ण को समझ लेगा वह कभी अवसाद में नहीं जाएगा। कृष्ण आनंद के देवता है। कुछ छूटने पर भी कैसे खुश रहा जा सकता है, यह कृष्ण से अच्छा कोई सिखा ही नहीं सकता।विपरीत परिस्थितिंयो मे प्रसन्न रहना और प्रतिकूलता और अनुकूलता को समान समझ कर दृष्टा भाव मे स्थित रहने का नाम ही कृष्ण है।भयंकर रण समर मे श्री गीता का ज्ञान देना ही कृष्ण है।बड़े से बड़े असुर का वध करना और जन हित मे रण छोड़ कर भागना ही आपको कृष्ण बनाता है।पहली गाली पर सर काटने की शक्ति होने के बाद भी यदि 99 और गाली सुनने का ‘सामर्थ्य’ है, तो वो कृष्ण हैं। ‘सुदर्शन’ जैसा शस्त्र होने के बाद भी यदि हाथ में हमेशा ‘मुरली’ है, तो वो कृष्ण हैं। ‘द्वारिका’ का वैभव होने के बाद भी यदि ‘सुदामा’ मित्र है, तो वो कृष्ण हैं। ‘मृत्यु’ के फन पर मौजूद होने पर भी यदि ‘नृत्य’ है, तो वो कृष्ण हैं। ‘सर्वसामर्थ्य’ होने पर भी यदि सारथी’ बने हैं, तो वो श्रीकृष्ण हैं।इस अवसर पर बाल वृन्द शिवांग, महीका, आयुषी, गोल्डी, आयांश आदि ने श्रीकृष्ण के प्रादुर्भाव प्राकट्य के पश्चात भव्य रूप से आरती की तत्पश्चात लोगो के बीच प्रसाद का वितरण किया गया।








